सोमवार, 1 अगस्त 2022
बुधवार, 29 मई 2019
मंगलवार, 18 मार्च 2014
सोमवार, 29 अक्टूबर 2012
लोलीवुड़
पाकिस्तान की फिल्मी उद्योग हम 'लोलीवुड़’ के नाम से
जानते हैं ठीक मुंबइया फिल्मी उद्योग की तरह, 1959 से 1969 में राष्ट्रपति
अयूब के कार्यकाल के दौरान लोलीवुड़ का स्वर्णिम काल रहा और फिर 1988 से 2002 तक लोलीवुड़ का सितारा डूबता सा लगा। लेकिन हमेशा से पाकिस्तान
के टेलीविज़न सीरीयल्स काफी सराहे जाते रहे हैं, कुछ समय समय पहले एक शानदार पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ देखने को मिली और
अभी हाल ही में एक फिल्म “आईना” देखी जो वहाँ की सुपर हिट फिल्म मानी जाती है। आज तक सफलता के इस मुकाम तक कोई दूसरी पाकिस्तानी फिल्म नहीं पहुँच पायी है।
गीत-संगीत सभी बेहतरीन।
1977 में नज़र-उल-इस्लाम द्वारा निर्देशित
इस फिल्म का पहला सीन हूबहू 1975 में
बॉलीवूड की फिल्म ‘आँधी’ जैसा
था बहरहाल पूरे तीन घंटे
फिल्म ने बांधे रखा ठीक मुम्बईया मसाला फिल्मों की तरह। फिल्म देखते हुये लगा कि देशों
की आपसी राजनीतिक उठा-पटक से
अलग उनके बीच की सांस्कृतिक समानता कहीं न कहीं आ कर मिल ही जाती है।
बुधवार, 15 अगस्त 2012
गुरुवार, 5 जुलाई 2012
The Big Cog: ACT Government 2011-12 Budget
The Big Cog: ACT Government 2011-12 Budget: There is only so much that cycle advocacy can achieve. I was pleased, not elated, to see some commitments in this years ACT Government Bud...
The Treasures Of My Heart: Knitted facial scrubber
The Treasures Of My Heart: Knitted facial scrubber: I was thinking of face scrubbies the other day and realized I posted a pattern for a crochet one but not a knitted one. So, I grabbed some...
सोमवार, 2 जुलाई 2012
Raji's Ramblings: GOLDEN SHAWLS AND A TEMPLE
Raji's Ramblings: GOLDEN SHAWLS AND A TEMPLE: A couple of months ago, our music group Gangamritham was felicitated at the Sai Baba Temple , after we sang there. We were honoured with p...
रविवार, 1 जुलाई 2012
Tea with the Vintage Baroness: Hooked on 30s Crocheted Handbags
Tea with the Vintage Baroness: Hooked on 30s Crocheted Handbags: There is no better way to perfect one's vintage look than vintage accessories. If you love 30s crochetwear like I do, you may already notic...
शनिवार, 30 जून 2012
Sated Magazine: Welcome to the online home of sated magazine. We'r...
Sated Magazine: Welcome to the online home of sated magazine. We'r...: Welcome to the online home of sated magazine. We're still getting things up and running around these parts, but please stay tuned for upcomi...
बुधवार, 27 जून 2012
भरी तरुणाई में जीवन का अस्त होना
ध्वनियों के छितरे हुए कतरे नहीं
छोटे और महीन तिनके हैं
ये बातें
एक-एक कर इकट्ठी होती चली गयी जो
दोस्ती के एक हरियाले पेड़ पर
इन्हीं तिनकों से नन्हा सा घोंसला बनाता है
कहीं से उडते-उडाते
दो चिडियों का जोड़ा उस हरियाले पेड़ पर रहने लगता है
और फिर एक दिन
एक जालिम झोंका बातचीत के इस
घोंसला को तितर बितर कर देता है
और यत्न से इकठ्ठे किये तिनके चारों दिशाओं में बिखरे नज़र आते हैं
इंटरनेट की आभासी दुनिया इतनी आभासी दुनिया नहीं है जितना की इसे समझा जाता
है. इस आभासी दुनिया के आंगन में भी कई संबंध बनते-बिगडते हैं. कई नन्हें
दोस्त भी बनते है जो अभी जीवन के बड़े-बड़े
जूतों में अपने पाँव डाल कर चलना सीख ही रहे होते हैं.
तहलका के फोटोपत्रकार तरुण सहरावत से परिचय करवाने का माध्यम भी यही इंटरनेट ही
बना. महज डेढ़ साल की यह आभासी दोस्ती अचानक एक गहरे शोक में बदल गयी जब १५.६.१२ को
तरुण के अचानक से चले जाने की खबर मिली.
फोटो पत्रकारिता का युवा चेहरा तरुण सहरावत अब हमारे बीच नहीं हैं. उसके
अनगिनत जान पहचान वाले, दोस्त, नाते-रिश्तेदार सभी स्तब्ध थे. तरुण की फेसबुक वाल
शोक संदेशो से भरने लगी है जो कुछ दिनों की सरगमी के बाद कहीं गुम हो जायेगी
दुनिया के पिछले दस्तूर के मुताबिक.
“आपकी दिवाली कैसी रही” वाक्य से तरुण से बातचीत की
शुरुआत हुई और चार जून को मेरी प्रोफाइल पिक्चर पर तरुण की टिप्पणी और एक लिंक जिस
पर तरुण के अबुजमर्ड, (छतीसगढ़) के माओवादी इलाके में खींचे गए थे के चित्रों के बीच
में ही हमारी बातों का सिलसिला सिमट कार रह गया. इसबीच में तरुण से दो-तीन बार फोन
पर बातचीत भी हुई.
तस्वीरे ही तो थी जो बातचीत के सिलसिले को निरंतर धार देती रही. तरुण की भेजी
हुयी पंजाब, बिहार, दिल्ली की तस्वीरों के अनेकों लिंक और फिर ये बातचीत कि आज में
लखनऊ में हूँ, आज पंजाब में, आज घर में बोर हो रहा हूँ, मम्मी-पापा गोवा गए हैं, तो
आपने अपने दोस्तो के साथ खूब मस्ती की आपकी तस्वीरे देखी मैंने, हाँ- हाँ जन्मदिन
ट्रीट जरूर दूँगा. क्या आज आप फ्री है आदि आदि.
तस्वीरों में दिलचस्पी के कारण ही वह हमेशां अपने दोस्तों के साथ मेरी तस्वीरों
पर अपना फोटोग्राफर रिमार्क जरूर दिया करता और जब साहित्य अकादमी और रमणिका गुप्ता
द्वारा संपादित “युद्धरत
आम आदमी महिला विशेषांक के एक संयुक्त आयोजन के सिलसिले में तरुण सहरावत से बात
करने का अवसर आया तो फोन के उस पार से शर्माती हुई एक तरुण आवाज़ सुनाने को मिली.
एक युवा की तरह तरुण भी सपनों और जुनून से लबरेज़ था फोटोपत्रकार था. कई
स्थानों और अनोखी, अनदेखी घटनाओं को अभी उसके कैमरे में कैद होना था.
युवा प्रोफ़ेसनलस को हमेशा से खतरे की स्तिथियों में आगे रखा जाता है. युवापन
की शोखी भुनाने के लिए व्यापारी दुनिया हर कदम पर तैयार रहती है. तरुण दुनिया को
अपनी लेंस के जरिये देख-परख रहा था ये सिलसिला ओर गंभीर होता चला जाना था.पर ये
खुशनसीबी हम लोगों को नसीब नहीं होनी थी.
भारत देश की पत्रकारिता के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार पी साईंनाथ ने एक बार कहा
था कि “मैं अक्सर महसूस करता
हूँ की पत्रकार सिर्फ ऊपरी पांच प्रतिशित को ही कवर कहते हैं इसलिए नीचें के बाकी पाँच
प्रतिशित पर मुझे ध्यान देना चाहिए”. पत्रकारिता में अपनी जान को अपनी भरोसे पर लेकर चलना होता
है. युवा पत्रकार अपने जुनून के चलते दूर दराज़ के भीहड इलाकों में चले जाते हैं. वहाँ
स्वास्थ्य और सुरक्षा के कोई इंतजामात उनके साथ नहीं चलते. ‘डू एंड डोनट्स’ की कोई हिदायते उनके साथ नहीं
होती. क्या इस तरह की लापरवाही से नाजुक स्थानों में भेजे जाने और वहाँ की परिस्तिथियों
से होने वाली मौत के प्रति उन संस्थानों की जवाबदेही हैं इस देश में, उन्हें कब ये
समझ में आयेगा कि देश के ये होनहार नौजवान इस तरह आकस्मिक काल का ग्रास बनने के
लिए नहीं है.
किसी भी युवा और होनहार इंसान
के इस दुनिया से चले जाना एक समाजिक दुःख की श्रेणी में आती है और तरुण की अकालमृत्यु
भी इसी क्रम की ताज़ा कड़ी है. छतीसगढ के जंगलों से लौट
कर मस्तिष्क
मलेरिया, टाइफाइड और पीलिया
से एक साथ लड़ते हुए तरुण थक गया था. शरीर की असंभव और
जटिल बाधाओं, जिगर, फेफड़े, गुर्दे, मस्तिष्क और कोमा को पछाड कर तरुण एक बार धीमे कदमों से
जीवन में लौट भी आया और होश में आते ही सबसे पहले तरुण
ने अपने कैमरे के बारे में पूछा. लेकिन १० जून को तरुण के मस्तिक्ष में तीव्रता से रक्तस्त्राव होने
लगा लेकिन अंत में हमने तरुण को १५ जून को खो दिया.
अपने चले जाने से पहले
तरुण ने उल्लेखनीय काम करते हुए देश की कुछ दुर्लभ तस्वीरों को कैमरे में कैद किया.
माओवदियों के गढ़ “अबुज्मढ़” बिहार की आदिवासी औरते, बच्चों की खालिस मासूमियत और
आदिवासी पुरषों के चेहरे पर पसरे सन्नाटे को सबने देखा. अपनी पारखी नज़र और चुस्त
निर्णय के जरिये तरुण अपने काम में माहिर था. आने वाले कितने ही नवांकुर
फोटोपत्रकारों के लिए तरुण सहरावत प्रेरणा का स्रोत होने का मादा रखता था.
एक कुशल फोटोपत्रकार की
तरह तरुण सहरावत, तकनीक और निर्णय करने की अद्भुद शक्ति के
जरिये छवियों पर कब्जा करता रहा. वह यह ठीक से जानता था
कि घटनाएँ किसी का इंतज़ार नहीं किया करती. एक फोटोपत्रकार को हमेशा तत्पर रहना
चाहिए और उसे अपना कैमरे को अपना बगलगीर बनाये रखना चाहिए. उसे अच्छे से मालूम था
कि दिलचस्प और मज़ेदार तस्वीरें फोटोपत्रकार के त्वरित और सतर्क निर्णय का ही
परिणाम होती हैं.
अथाह
दुःख का सबब बनी इस आकस्मिक मृत्यु को सबने लोदी रोड स्तिथ शवदाहगृह में शुक्रवार
३ बजे अंतिम विदाई दी. यहाँ मौजूद सभी लोगों का मन इस तरुण मौत पर हाहाकार कर रहा
था. मेरा तरुण से परिचय फेसबुक और महज
दो-तीन फोन वार्ता तक ही सीमित रह गया पर इस बाईस वर्षीय युवक की मासूमियत इसी दायरे
के भीतर रह कर भी मैंने बखूबी पकड़ ली और तरुण की यही मासूमियत उसकी आकस्मिक मौत को
और ज्यादा ग़मगीन बना रही है आज मेरे नजदीक. इस उम्मीद को पुख्ता बनाते हुए कि एक
इंसान के याद किये जाने के लिए जो चीजें काफी होती हैं वे हैं कोमल मन और एक मासूम मुस्कान.
तरुण सहरावत के कैमरे से
कुछ चित्र
गुरुवार, 14 जून 2012
Babba Bulleh Shah Poetry translated by Kartar singh Duggal
Translation: मेरी बुक्कल दे विच चोर
by Kartar Singh Duggal
-
There is a thief in the folds of my arms.
Whom shall I tell?
There is a thief in the folds of my arms
He has, of late, escaped on the sky
No wonder there is a stir in the sky
And the world there is a hue and cry.
Whom shall I tell?
The Muslims are afraid of fire
And the Hindus dread the grave
Both of them have their fears
And keep on sharpening their staves.
Whom shall I tell?
Ramdas here and Fateh Muhammad there
This has kept them emitting spleen
Suddenly their quarrel came to an end
When someone else emerged on the scene.
Whom shall I tell?
There was furore in the flushed sky
It reached Lahore, the capital town
It was Shah Inayat who crafted the kite
It’s he who moves it up and down.
Whom shall I tell?
He who believes, he alone has known
Everyone else id floundering
All the wrangling came to an end
When Bulleh came to town.
Whom shall I tell?
by Kartar Singh Duggal
-
There is a thief in the folds of my arms.
Whom shall I tell?
There is a thief in the folds of my arms
He has, of late, escaped on the sky
No wonder there is a stir in the sky
And the world there is a hue and cry.
Whom shall I tell?
The Muslims are afraid of fire
And the Hindus dread the grave
Both of them have their fears
And keep on sharpening their staves.
Whom shall I tell?
Ramdas here and Fateh Muhammad there
This has kept them emitting spleen
Suddenly their quarrel came to an end
When someone else emerged on the scene.
Whom shall I tell?
There was furore in the flushed sky
It reached Lahore, the capital town
It was Shah Inayat who crafted the kite
It’s he who moves it up and down.
Whom shall I tell?
He who believes, he alone has known
Everyone else id floundering
All the wrangling came to an end
When Bulleh came to town.
Whom shall I tell?
बुधवार, 30 मई 2012
शनिवार, 26 मई 2012
कहानी अनीता कुशवाहा की
युवा माहिलाओं को सशक्तिकरण की सीख लेनी हो तो मुजफ्फ़रपुर के पटियासा जलाल
गाँव की अनीता कुशवाहा से लेने चाहिए. अनीता इस समय मात्र २३ साल की हैं
और वह पूरी तरह आत्मनिर्भर तो हैं ही बल्कि संसार भर की युवतियों के लिए
प्रेरणा की स्त्रोत भी बनी हुई हैं.
लगभग १२ साल पहले अनीता ने मधु मक्खी पालन का कम शुरू किया था. तब घर वालो का विरोध था की यह काम स्त्रियों के बस का नहीं. लेकिन अनीता नहीं मानी और अपनी माँ के सहयोग से ४.००० में दो बक्से खरीद लिए आज अनीता के पास २०० बक्से हैं. पहले ही साल अनीता को मुनाफा मिलने लगा जिसका परिणाम यह हुआ की आज अनीता के गाँव के लगभग हर घर में मधुमक्खी पालन हो रहा है और शहद कारोबारी कंपनियों के एजेंट गाँव आ रहे हैं.
NCERT ने अनीता के इस प्रयास को स्कूल की पाठ्य पुस्तक में शामिल किया है.२००६ में UNICEF ने अनीता के काम को रेखांकित किया था तब ही संसार भर की नजरे अनीता पर टिकी और अनीता रातों रात युवाओं की ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाकों के युवाओं की रोल मॉडल बन गयी. अनीता ने उस वक़्त शादी कच्ची उम्र में अपनी शादी के इनकार कर दिया था और आगे पढने का फैसला किया. आज अनीता समाज शास्त्र में एम् ए की पढ़ाई पूरा कर चुकी हैं.
अनीता का उदाहरण साफ़ दिखता है की निचले स्तर स्वयं के प्रयासों से पर अपने गाँव में ही रह कर न केवल खुद की उन्नति की जा सकती है अपितु संसार भर की युवतियों के भीतर भी आत्मनिर्भरता की चिगारी को हवा दी जा सकती है.
लगभग १२ साल पहले अनीता ने मधु मक्खी पालन का कम शुरू किया था. तब घर वालो का विरोध था की यह काम स्त्रियों के बस का नहीं. लेकिन अनीता नहीं मानी और अपनी माँ के सहयोग से ४.००० में दो बक्से खरीद लिए आज अनीता के पास २०० बक्से हैं. पहले ही साल अनीता को मुनाफा मिलने लगा जिसका परिणाम यह हुआ की आज अनीता के गाँव के लगभग हर घर में मधुमक्खी पालन हो रहा है और शहद कारोबारी कंपनियों के एजेंट गाँव आ रहे हैं.
NCERT ने अनीता के इस प्रयास को स्कूल की पाठ्य पुस्तक में शामिल किया है.२००६ में UNICEF ने अनीता के काम को रेखांकित किया था तब ही संसार भर की नजरे अनीता पर टिकी और अनीता रातों रात युवाओं की ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाकों के युवाओं की रोल मॉडल बन गयी. अनीता ने उस वक़्त शादी कच्ची उम्र में अपनी शादी के इनकार कर दिया था और आगे पढने का फैसला किया. आज अनीता समाज शास्त्र में एम् ए की पढ़ाई पूरा कर चुकी हैं.
अनीता का उदाहरण साफ़ दिखता है की निचले स्तर स्वयं के प्रयासों से पर अपने गाँव में ही रह कर न केवल खुद की उन्नति की जा सकती है अपितु संसार भर की युवतियों के भीतर भी आत्मनिर्भरता की चिगारी को हवा दी जा सकती है.
सोमवार, 9 अप्रैल 2012
In the name of those Empty Days/Vipin Choudhary
When even the slower pace of life, could not be hold,
Just unknown activities,
Hopeless problems himself were to
harass.
The riders of mind were not
provided with proper nurishment,
Those dull days, wake the strong desire to become an ascetic.
In Sad days,mind was automatically mapping the
Himalyan.
In those very days,we stepped out
in unlustful and clean premises,
Without any warm wrapping.
Bereft of father's protection and
mother's love,
Those days were the orphan days
to live our own.
Beyond the softness of love and any confussion,
A far spreaded, scattered days,
Somewhere far away from the
mildew days.
Away from everyday scrimmage and
Tam ladder dredge,
Clean and , tidy.
Sprawling days like the clothes
hung on ripcord.
Even the nights settling down at
the edges of those days,
Forgot the paths of dreams.
Then only, revealed the common
strategy of world and dreams.
We were sitting with our back
toward worldliness,in those days,
And there was a secret agreement
between worldliness and dreams
With deaf ear to every knock; the
days of solitude stubborn yogi,
Then we had donated the entity of, all the worries.
Making proper distance; Like table-cloth laid
straight, in wait,
In those days we drank enough geriatric
rosy-evenings.
Slept with firmly tied corners of
white sheet.
Relentlessly to target on stone
age;
We wanted to blow up our pet
dreams, one by one,
In those very days.
Also, we wanted to see ;How Big
is the sky for those dreams?
Blood was dripping for years, in
the courtyard of our soul.
And the resulted anguish of not
realised them was reduced in compunction.
Nevertheless, the dreams have
left their footprints.
When the turn of choosing
something come up;
In queuing times,never falling
short in the series,
We chose those peerless days.
So far, we did not have chewed a
piece of them,
The days with head tied scarfs,
Go by looking at the sight of
squirrel’s agility.
Yet there was not any compunction
on;
Losing of noon of the day.
The smell of gas gulped in the
arteries, and we are certain.
On otherwise days we might be packed into a bundle, with died
of fear.
But those were unsurpassed days.
The pleasure to sit close to
those days was delight and frowzy,
When in any exercise; those days will be recorded,
The same days will make NOISE in
our ACCOUNT.
Translated by the poet herself
शुक्रवार, 30 मार्च 2012
( हरियाणवी कविता )
( हरियाणवी कविता )
न्यू क्युकर
मीं बरसा और छाती मह हूक सी ना उट्ठी
बारणा गाडण जोग्या
मोरणी सा कोनी नाच्या
ईब काल भादों मैं सीसम ना हांसी
ना इंडी हाथां तैं छूट भाजी
जंगले पह खड़ी मैं बासी
आँख्यां तैं लखान लागी
लुगाइयां का रेवड़
घाघरां पाछै लुख ग्या
बखोरे में गुलगुले ना दिखे
ना टोकणी बाजी
बेरा कोणी या
धक्कम-धक्का किस बाबत प होरी सै
धक्कम-धक्का किस बाबत प होरी सै
ऊँटनी का यो
मोसम कढ जव्गा
नई बहु पींघ ना चढ़ी
ना छोटी ने सिट्टी बजाई
ना नलाक्याँ पर होई लड़म -लड़ाई
ना ताऊ ने ताई के खाज मचाई
ना गंठे- प्याज की शामत आई
न्यू क्युकर
मीं बरसा और फ़ौजी छुटटी प न आया
कढाव्णी में दूध उबलन लाग्या
चाक्की के पाट करड़े होगे
इस मीं के मौसम नें इस बार खूब रुआया
खूब रुआया अर जी भर कीं रुआया
बीजणा भी ईब सीली बाल कोनी देनदा दिखय
ऊत का चरखा भी इब ढीठ हो गया
सूत कातन तह नाटय स
सीली बाल सुहावै कोनी
मी का यो मौसम इब जांदा क्यों नी
बुधवार, 25 जनवरी 2012
कलात्मकता के विभिन्न आयाम
जब पेरिस की कलाकार जुलियना सांताक्रुज
हेरेरा ने देखा कि पेरिस
की सड़कें बहुत टूटी-फूटी और और उदास हैं, इन्हें ताजा स्पर्श की जरूरत है
. इसी अवधारणा को मन में सहेजें
उन्होंने फैसला किया कि वह शहर की
सड़कों के गड्ढों को रंगीन कपड़ों की चोटियाँ बना कर भरेगी और उसने ऐसा किया भी. उन्होने रंगीन चोटियाँ बना कर सड़कों के गड्ढों
को भर कर आकर्षक बनाया और पेरिस की ग्रे सड़कों से अपनी कला से सराबोर कर रंगीन कर दिया.
बुधवार, 14 दिसंबर 2011
नूर्नबर्ग परीक्षण”
जर्मनी के बावरिया शहर में नूर्नबर्ग नाम का एक स्थान हुआ करता था,
जहाँ १९४५-४६ में सैन्य ट्रिब्यूनल की एक
श्रृंखला आयोजित की गयी जिसके आयोजक थे द्वितीय
विश्व युद्ध के विजयी मित्र देश.
इस सैन्य ट्रिब्यूनल
को ‘नूर्नबर्ग परीक्षण’ का नाम दिया गया लेकिन इस परिक्षण के शुरू होने
से पहले ही इस युद्ध के कई मुख्य आर्किटेक्ट लोगो जैसे कि एडॉल्फ हिटलर, हेनरिक
हिमलर, और जोसेफ गोएब्बेल्स
ने आत्म हत्या कर ली थी. इसी नूर्नबर्ग परीक्षण को लेकर रूसी
फिल्मकार रोमन कारमेन ने नाम से एक डोक्युमेनट्री बनाई जिसका नाम था “नूर्नबर्ग परीक्षण” ५८ मिनट की इस फिल्म १९४७ में रिलीज़ हुई थी.
इस बेहद चर्चित फिल्म का यह पहला भाग.
शनिवार, 29 अक्टूबर 2011
जवाबी पोस्टकार्ड : लेखक श्रीलाल शुक्ल


लेखन का रोग जब नया नया ही लगा था उस समय नामचीन लेखको से पत्र व्यवहार करने का जुनून जहन मे सवार था. अपने लिखे पत्रों के जवाब का लम्बा इंतज़ार रहता . उनके जवाबी पोस्टकार्ड मे लिखी पंक्तियाँ काफी दिनों तक याद रहती. उस दौर मे श्री विष्णु प्रभाकर, निर्मल वर्मा, ज्ञानरंजन, लीलाध्रार जगूड़ी, नीरज, रमेशचंद्र शाह, गिरिराज किशोर, भगवत रावत, स्वदेश दीपक, शेखर जोशी, कन्हईयालाल नंदन, अलोक मेहता, चित्रा मुदगल, चंद्रकांता, हिमांशु जोशी के साथ पत्र व्यवहार चला. जिनमे विष्णु प्रभाकर, स्वदेश दीपक और निर्मल वर्मा जी से बहुत कुछ सीखा और इन तीनों से लम्बा पत्र व्यवहार जब तक यह तीनों लेखक हमारे बीच से चले नहीं गए. इन तीनों माननीय लेखको के ढेरो पोस्टकार्ड मेरे पास सुरक्षित हैं जिन्हे पढ़ कर हर बार नई उर्जा मिलती है. इसी क्रम मे २००५ को श्रीलाल शुक्ल को उनका प्रशिद्ध रागदरबारी पढ़ कर एक पोस्ट कार्ड लिखा था जिस के जवाब मे उनका यह जवाबी पोस्टकार्ड आया.इसमे वर्णित चंद पंक्तियों मे ही लेखक की निराशा झलकती है. लेखक अपने लेखन से संतुस्ट नहीं दिखते यह निराशा किन कारणों से है. आज मे इस सोच मे हूँ कि उनके जाने के बाद ही हम क्यों उन्हे महिमामंडित करते हैं उनके जीते जी उन्हे खुशनुमा वातावरण क्यों नहीं देते जिनके वे हक़दार है.
समाज एक लेखक को निराशा भरा वातावरण क्यो देता है . जबकी लेखक समाज का ही सटीक चित्रण कर रहा होता है और वो सच्चाई भी वह अपने लेखन मे प्रस्तुत करता है जिसे हम आम तौर पर नज़र अंदाज़ कर गुज़र जाते हैं.
एक लेखक के लिये सामाजिक प्रोत्साहन का आभाव इस कदर क्यों है. जबकी श्रीलाल शुक्ल ढेरो रचनाओ के साथ एक कालजयी उपन्यास रागदरबारी दुनिया को दे चुके हैं.
यह एक विचारणीय प्रशन है जिसका जवाब हमारे ही पास है.
शनिवार, 22 अक्टूबर 2011
अब मैं राशन की कतारों मे नज़र आता हूँ : जगजीत सिंह आम जनता के ख़ास गायक
एक दौर में ग़ज़ल नाम था एक दुरूह रचना का, जिसमे उर्दू के कठिन शब्दों का समावेश होता था, एक दूसरे दौर मे जिन गायको की मार्फ़त ग़ज़ल की जुदा पहचान मिली उनमे जगजीत सिंह का नाम सबसे ऊपर है. जगजीत सिंह ने ग़ज़ल को ख़ास क्लास से बाहर निकाल कर आमो ख़ास तक पहुँचाया, तब उन्होने निदा फाजली, दुष्यंत कुमार, बशीर बद्र के लेखन को अपनी बुलंद आवाज़ मे गाया l इन गजलो मे इंसानी जीवन के रोज़मर्रा के सुख दुःख जुडे होते थे. जिस से हम सभी अपने आप को जोड़ कर देखते थे. बानगी के तौर पर जगजीत सिंह द्वारा गयी गयी यह गजले.अब में राशन की कतारों मे नज़र आता हू
कभी आंसू कभी खुशी बेची
आदमी आदमी को क्या देगा
मुह की बात सुने हर कोई
ये जो जिन्दगी की किताब है
परखना मत परेख्नी से कोई अपना नहीं रहता
जगजीत सिंह अपनी एल्बम मे नए आवाजों को शामिल कर उनका होंसला बढ़ाते थे
विनोद सह्गेल और सिजा रॉय ऐसे ही दो नाम थे जिनकी बेहद खूबसूरत आवाज़ को जिसने भी सुना वाह वाह कर उठा. सुनने वाले के कानों मे एक ताजगी का अद्भुद रस घुलता चला गया
जगजीत सिंह ने फिल्मो मे भी खूब गाया उनके द्वारा स्वरबद्ध कुछ फ़िल्मी गजलें
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
मेरे दिल में तू ही तू है
वो कागज़ की कश्ती
यह तेरा घर यह मेरा घर
फिर आज मुझे
रिश्ता यह कैसा है
हमसफ़र बनके हम
यह बता दे मुझे ज़िन्दगी
प्यार मुझ से जो किया तुमने तो क्या पोगी
तू नहीं तो ज़िन्दगी में और क्या रह जायेगा
कोई यह कैसे बताये
यूँ ज़िन्दगी की राह में मजबूर हो गए
झुकी झुकी सी नज़र
तुम को देखा तो यह ख्याल आया
जगजीत सिंह की गजले और अवसाद का गाढ़ा रंग
जगजीत सिंह के स्वर मे जो अवसाद का रंग घुला हुआ है वह शिव कुमार बटालवी जैसे कवियों के दर्द भरे लेखन मे और गहरा हो जाता है. उनके गाये ये पंजाबी गीत मील का पत्थर बन गए है. जिन्हे पंजाबी भाषा से परिचय नहीं है वे भी इन्हे सुनकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहते.
माये नी माये मै एक शिकरा यार बनाया नी
रोग बन के रह गिया है पियर तेरे शहर डा " ,
"यारियां राब करके मेनू पाएं बिरहन दे पीदे वे ",
"एह मेरा गीत किसी नि गाना "
जगजीत सिंह के गाये पंजाबी टप्पे भी खूब प्रसिद्ध हुए हैं
मसलन
चूल्हे आग न घडे दे विच पानी चड्याँ दी नहीं निभदी
कोठे थे आ माहिया
लारा लापा लाई रखदा
मिट्टी डा बावा बनाया नी
जीवन मे रंग भरते यह गीत और ग़ज़ल हमारी दुःख तकलीफे हर लेने का मादा रखते है और जीवन की उदासी को परे कर देते हैं, हम जगजीत सिंह को सुनते और खुश होते कि हमारे पास जगजीत सिंह जैसा विरल गायक है जिस की आवाज हमारे मन मे सीधी उतरती है. देश विदेश मे उनके गजलो के हजारो शो हुए.
जगजीत सिंह का अपना अलहदा मुकाम
१९७० के उस दौर मे जब फ़िल्मी दुनिया के पास एक से बढ़ कर एक नायब गायक थे जिन मे मो रफ़ी, किशोर कुमार, तलत महमूद और हेमंत कुमार का नाम पहली पंक्ती मे था तब अपनी अलग पहचान बनाना आसन नहीं था. साहिर के रोमांटिक गीत और मोहमद रफ़ी की मुलायम आवाज़ का नशा कभी न उतारने वाला नशा था. पर आज़ादी के बाद का ये सुरूर से भरा दौर था जब नई समाज का नए सिरे से गठन हो रहा था. उसके बाद १९८० का दौर मोह्हंग का दौर हो चला था उस आधुनिक समय के लिये जनमानस कई चीजों को परख रहा था. उसी समय राजस्थान के गंगा नगर का एक नौजवान ग़ज़ल का साथ ले कर संगीत के मैदान मे उतरा. वह जानता था की मंजिल मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं.और यह उस जुनून का ही परिणाम था कि कुछ समय बाद जगजीत सिंह नाम का एक सितारा गायन के मैदान पर उतरता है और चारों दिशाओं में छा जाता है.
१९८७ मे मल्टी ट्रैक रेकॉर्डिंग मे गाने वाले जगजीत सिंह और चित्र सिंह पहले गायक बने और उस समय उनकी उस एल्बम का नाम रखा गया ' बियोंड टाइम'
जगजीत सिंह और चित्र सिंह की इस पहली एल्बम के ये गाने बहुत लोकप्रिय हुए
झूठी सच्ची आस पर जीना आखिर कब तक
ये करे और वो करें
मेरा दिल भी शौक से तोड़ो
लोग हर मोड़ पे
अपनी आग को जिन्दा रखना
फ़िल्मी गीतों से अलग इन गजलो का तापमान इंसानी रूह के उस तापमान से मिलता जुलता था जो रोमांटिक, मायावी, तिलस्मी और सोंदर्य बोध मे लिपटा हुआ नहीं था अपितु इन्सान की रोजमर्रा की थकान, उब, और टूट से जुड़ाव रखता था.
गरज बरस प्यासी धरती को
घर से मस्जिद है बहुत दूर
बदला न अपने आप को
जगजीत सिंह का गजलो का चुनाव बेहतरीन होता था जो जीवन की शुष्क मिट्टी सा धूसर होता था
यही नहीं जब जगजीत सिंह ने फिल्मो की तरफ रुख किया तो भी खूब वाह वाही लूटी.फिल्म प्रेमगीत का गीत होठो से छु लो तुम मेरा गीत अमर कर दो तो एक कालजई गीत बन ही गया है.
फ़िल्मी अभिनेताओ राज किरण और फारुक शेख पर जगजीत सिंह की आवाज़ खूब फबी.इसके अलावा महेश भट्ट निर्मित फिल्म 'अर्थ' के कैफी आज़मी द्वारा लिखे सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए.
जगजीत सिंह ने हिंदी और पंजाबी फिल्मों के अलावा भी खूब दिल खोल कर खूब गाया, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी की लिखी कविताओ पर जगजीत सिंह ने दो अलबम निकले १९९९ में नई दिशा और २००२ में संवेदना जो काफी मशहूर हुई.
समाज सेवा को जगजीत सिंह ने गायकी के साथ जोड़ा बच्चो के लिये समर्पित संस्था क्राई के लिये अलबम क्राई फॉर नाम से और प्रभु भक्ति की माँ के अद्भुद भजनों से हरे कृष्ण, माँ, हे राम ...हे राम , इछाबल और मन जीती जगजीत (पंजाबी ) में सच तो यह है की बौद्धिक संसार तो महान कलमकारों की लेखनी का जानकार और कायल था ही पर आम जनता की जुबान पर महान रचनाकारों की शायरी को गुनगुनाने का श्रेय काफी हद तक जगजीत सिंह को ही जाता है उन्होने मिर्ज़ा ग़ालिब ,फ़िराक गोरखपुरी , कतील शिफाई, कबीर, अमीर मीने , कफील आजेर, सुदर्शन फाकिर और निदा फाजली और समकालीन शायरों जैसे कि जका सिदिदिकी , नज़र बकरी , फैज़ रतलामी, राजेश रेड्डी और अभिषेक श्रीवास्तव के लेखे को अपनी बुलंद आवाज़ मे गाया.
हाल के वर्षो मे बनी कुछ फिल्मो जैसे दुश्मन , सरफ़रोश , तुम बिन और तरकीब मे उनकी गजलो का इस्तेमाल किया गया जिसे म्यूजिक पर धिरक्ने वाली युवा पीढी ने भी खूब पसंद किया.
हाल ही मे (२०११) काफी समय के बाद जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की गोदी ने युगल स्वरों मे एक ग़ज़ल संग्रह रिकॉर्ड किया.
बेमिसाल जोड़ी के रूप मे जगजीत सिंह और चित्र सिंह की आवाज़ अमर रहेगी. जब दोनों युगल स्वरों मे गाते है
बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी
आये है समझाने लोग है कितने दीवाने लोग
उस मोड़ से शुरू करे फिर ये जिन्दगी
अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दे
मेरे जैसे बन जाओगे
तो हमेशा चिर परिचित करतल ध्वनि बज उठती है.
१९८८ मे गुलजार द्वारा निर्देशित मिर्ज़ा ग़ालिब के जीवें पर बना टेलीविज़न सीरियल मे जगजीत सिंह ने अपनी बुलंद आवाज़ दी तो लगा मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब फिर से जीवित हो उठे हैं. उनकी शायरी आज भी लाखो लोगों की जुबान पर है जो जगजीत सिंह की आवाज़ पा कर आम जन तक पहुँची.
आह को चाहेये
बगीचा ए अफ्ताल है दुनिया मेरे आगे
दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है
कबसे हूँ क्या बताऊँ
न था कुछ तो खुदा था
वो फिराक और वो विसाल कहाँ
यह न थी हमारी किस्मत
जुल्मत कदे में मेरे
उनके देखे से
हजारों खावईश्य ऐसी
जगजीत सिंह ने २००७ 'अदा' और २००८ मे 'सजदा' नाम से लता मंगेशकर के साथ गया और आशा भोंसले के साथ गयी ग़ज़ल के साथ उनकी विडियो एल्बम जब सामने तुम आ जाते हो न जाये क्या हो जाता है युवाओ मे काफी पसंद की गयी. बाद में ऑडियो के साथ वीडियो मे भी जगजीत सिंह की गजलो के साथ देश के नामी मोडल्स ने काम किया गुलज़ार के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब मे अपनी आवाज़ देने के बाद गुलज़ार की लिखी 'त्रिवेणी' नाम की हिंदी और उर्दू की नई विधा, जिस मे तीन मिसरे होते हैं को भी जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी जिसे सोनी म्यूजिक ने 'कोई बात चले' नाम से रिलीज़ किया.
चिठ्ठी न कोई सन्देश, जाने कौन से देश तुम चले गए
दिमाग की नस फटने के कारण जगजीत सिंह मुंबई के लीलावती हॉस्पिटल मे भारती हुए तो देश विदेश मे उनकी सलामती के लिये प्रार्थनाये की जाने लगी पर १० अक्टूबर को वे अपने कहने वालो की आंखे नाम कर परम धाम चले गए .
यदि जगजीत सिंह के पास कुछ और जीवन के हिस्सा होता तो वे ग़ज़ल की दुनिया मे अपना कुछ और रंग भरते और हमारे जीवन के साथ कुछ और सुर जुड़ जाते. गायक अपनी गीतों के जरिये सदा अमर रहता है यह एक शाश्वत सत्य है और इसी सत्य पर हम सबको यकीन है.
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