मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

फैज़ अहमद फैज़ के खत, दानिश इकबाल की आवाज़ और दुख का उजला पक्ष


''दुख और नाखुशी दो मुखतलिफ और अलग-अलग चीज़ें हैं और बिलकुल मुमकिन है कि आदमी दुख भी सहता रहे और खुश भी रहें"। ये पंक्तियाँ फैज़ अहमद फैज़ ने जेल की चारदीवारी में रहते हुऐ अपनी पत्नी को १५ सितम्बर १९५७ को लिखी थी। ख़त के माध्यम से दुनिया के सामने दुख का अनोंखा और उजला पक्ष रखने वाले फैज़ को आज हम उंनकी जन्म शताब्दी पर याद कर रहे है जिसके तहत देश भर में उन्हें अलग -अलग तरीके से उन्हें याद किया जा रहा है। राजधानी दिल्ली में भी फैज़ की याद को समर्पित कई कार्यक्रम आयोजित किऐ जा रहे हैं । इसी कडी में एक खूबसूरत कार्यक्रम बीती रविवार को इंडिया हबिटैट सेन्टर की खुली छत पर आयोजित किया गया। रंगमंच और रेडियो के दो दिग्गजों दानिश इकबाल और सलीमा राजा ने फैज़ के लगभग ३०-३५ खतों के सार पढ़े। जिस नाटकीय लय में दोनों ने फैज़ के लिखे को अपनी आवाज़ दी वह बेहद दिल ओ दिमाग को सुकून देने के साथ कानो मै भी शहद घोलने वाला रहा, लगभग ढाई घंटें वहाँ मौजुद लोग मुग्ध हो उन्हें सुनते रहे। उस समय पूरा माहौल फैज़मय हो उठा जब इकबाल बानो और शौकत खान जैसे महान गायकों द्वारा गई उनकी तीन गज़लें को भी सुनाया गया ।

१९५० के उस दौर में जब पूरा उपमहाद्वीप राजनीतिक अशांति से गुज़र रहा था, तब इस प्रबुद्ध दम्पति के ज़ीवन में क्या उधल पुधल चल रही थी इसका पता हमें उनके द्वारा लिखे इन पत्रों से मिला। ये पत्र जीवन को तिरछी नज़र से भी देखने का साहस दिखाते हैं। फैज़ अपने पत्रों में अपनी पत्नि से बार-बार यह गिला कर रहे थे की उन्कें जेल मे रहने से उनहें घर और बहार दोनों की जिम्मेदारेयाँ संभालनी पर रही हैं।

जीवन के किसी मोड पर जब इन्सान का सामना दुःख से होता है तो वह लगभग विचार शुन्य हो जाता है। फैज़ के लिये उस खास घडी से उपजे दुःख के अलग मायने थे, तब समझ मे आता है की दुःख को कितनी शायस्तगी से जीया था फैज़ ने। दुख से घबराने वाले और दुख में ढूब जाने वाले हम सतही चीज़ों पर ही विचार करते रह जाते हैं। पर कहतें हैं कि सामान्यता से ठीक उलट जीवन को बेहतर तौर पर जीने का रास्ता कोई विलक्षण बुद्धी वाला ही खुल कर सामने रख सकता है और इसी सोच का सामने रखा फैज़ ने.

फैज़ के पत्रों के जवाब में उनकी प्रबुद्ध ब्रिटिश पत्नी अल्यस फैज़ के जवाब भी उतने ही गहन और माकूल थे। ये सभी ख़त निजी होते हुऐ भी सामाजिक दृष्टी से महताव्पूर्ण है और जीवन को नयी दिशा दिखाने का काम करते है जब जीवन में सरे राह चलते चलते कई तरह की परेशानियाँ हमें घेर लेती हैं तो उस वक़्त में कैसे उनसे पार पाया जा सकता है यह सोचने का विषय है। सबका दुख अलग-अलग होता है और दुख को देखने का नज़रिया भी। ज़ब हमारे लाख चाहते हुऐ भी जब कुछ अज़ीज चीज़ों की परछाई हमारे पास से बहुत दूर चली जाती हैं और जो चीज़े समय की तेज़ रफ़्तार में हमारे हाथ से छुट जाती है उनहें खोने का दर्द हमें बार बार सालता है । कुछ अति संवेदनशील लोगों के लिए दुख एक टानिक का काम भी करता है और यह भी सच है कि दुःख का वातावरण कला में पैनापन ले आता है तभी जब-जब भी समाज में बडे तौर पर विपत्ति आई है तब कला भी सघनता से उभर आई है। जैसे दक्षिण अफ्रीकन देशों की त्रासदी, नाइजीरिया का गृहयुद्ध, भारत-पाक विभाजन, सोवियत-रुस का विखंडन आदि एक बडी त्रासदी के रूप में जब समाज में उभरी तो कला मे पैनापन आया । नोबल पुरस्कार विजेता ब्रिटिश लेखिका डोरोथी लेंसिंग का मानना है "आँसू वास्तव में मोती हैं" और असदुल्ला खान ग़ालिब भी कह गए है "दर्द के फूल भी खिलते है बिखर जाते हैं, जख्म कैसे भी हो कुछ रोज़ में भर जाते है" लेकिन फैज़ ने दुःख -दर्द का जो मनोवाज्ञानिक विश्लेषण किया है वह बेमिसाल है। निजता बहुत अज़ीज़ चीज़ है मगर उससे इतना विस्तार देना भी ताकि उससे बाकी लोग भी सबक ले सके, यह बडी बात है।

भावनाओं का सार, खुशी का उत्साह, अवसाद की अकड़न, चिंता की चिंता, यह सब मस्तिक्ष में ख़ुशी औरउल्लास की भावनाओं की तरह ही एक आसमानी इंद्रधनुष की तरह से हैं जो क्षणभंगुर होता है।

जहाँ तक शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की संरचना को खंगाला के बाद यह निष्कर्ष निकला कि मस्तिष्क सिर्फ एक भावनात्मक केन्द्र नहीं है जैसा कि लंबे समय से यह माना जाता रहा है, बल्कि वहां अलग-अलग भावनाओं की सरंचना भी शामिल है। पुरुषों और महिलाओं के दिमाग मे सुख और दुख अलग- अलग तरह से असर डालते है। न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर जोसेफ फोरगस ने इस पर शोध कर यह परिंणाम निकाला कि नाकारात्मक मूड में लोगों की रचनाशीलाता अधिक बढ़ जाती है। पीडा एक सार्वभौमिक प्रेरक तत्व है, जब हम पीडा में उलझे होते हैं तो इससे बाहर आने के उपाय खोजनें लगते हैं और इसके उबरने के लिये अपनी गतिविधियाँ बढा देते हैं यह ठीक ऐसा ही है जैसे दलदल में फसें होनें पर उस से बाहर निकलनें के लिये हाथ-पाँव मारना। यह सच है जब हम दूर खडे होकर अपने दुख की अनुभूति को देखने, परखने और परिभाषित करने की शमता विकसित करेगें तभी दुसरों के दुख में हमारी भागीदारिता बढ सकेगी। इस मामले में कई संवेदनशील विभूतियों की तरह फैज़ भी धनी थे तभी वे दुख का सटीक विश्लेषण कर सके।

बहरहाल फैज़ अपने इसी खत में आगे लिखते है

"दुख और नाखुशी दो मुखतलिफ और अलग-अलग चीज़ें हैं और बिलकुल मुमकिन है कि आदमी दुख भी रहता रहे और खुश भी रहें। दुख और ना-खुशी खारिज़े चीज़ें हैं जो हमारी या हादसे की तरह बाहर से वारिद होते है, जैसे हमारी मौजुदा जुदाई हैं। या जैसे मेरे भाई की मौत है ,,, लेकिन नाखुशी जो इस दर्द से पैदा होती है अपने अंदर की चीज़ है ये अपने अंदर भी बैठी पनपती रहती है,,,और अगर आदमी एतीहात ना करे तो पुरी शक्सियत पर काबू पा लेती है,,,दुख दर्द से तो कोई बचाव नहीं ,,,लेकिन ना खुशी पर घल्बा पाया जा सकता है,,,बशर्त की आदमी किसी ऐसी चीज़ से लौ लगा ले की जिसकी खातिर जिंदा रहना अच्छा लगे"।

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

वेद नायर और उन्की कलाकृति ( nail crucified head)

कलाकार को समाज का आलोचक भी माना जाता है। माना यह भी जाता है कि कला के माध्यम से वह जो भी रच रहा है वह खूबसूरत और मन को देर तक तरोराज़ा रखने वाला होगा पर जब समाज़ की नुकीली कीले किसी कलाकार को चुभती हैं तो उसकीकलाकृति कुछ इस तरह से बन कर सामनें आयेगी जो वेद नायर ने अपनी इस कलाकृति में दशाई है। हम सोच सकते हैं जब एककलाकार संक्रमण के दौर से गुज़र रहा होता है तो उसके भीतर क्या कुछ टूट चुका होता है.

वेद जी का मानना है कि आज के दौर में शासन पर कानून की पकड पूरी तरह ढीली हो चुकी है, बदमाशो ने सभ्य लोगों का जीनादूभर कर दिया है। शाति से काम करने वाले कलाकार को समाज की उन विसंगतियों से लडना पड रहा है जिस से अब तक उनकाकभी पाला नहीं पडा था। उनका दोष केवल इतना है कि वे इस तथाकथित लोकतंत्र के हिस्से है जहाँ सरेआम गुडों का बोलबाला हैजो उन्के शांतिमय जीवन को बर्बाद करने पर आमादा हैं. अपनी इस कलाकृति को वेद जी नए साल की शुभकामना सन्देश के रूपमे इस्तेमाल करते है तो इसका गहरा अर्थ होता है जिसे साफ़ तौर पर समझा जा सकता है.

पर्यावरण हमेशा से वेद नायर की प्रमुख चिंता का विषय रहा है. उन्की प्रस्तुत काम मे भी (सामाजिक पर्यावरण) का असर देखने को मिल रहा है. इसे देखे, समझे और स्वयं को इस दशा का सामना करने के लिये हमेशा तैयार रखे.

सोमवार, 10 जनवरी 2011

मरीना तसेवेतायेवा की कविता


1892 में जन्मी रशियन कवियत्री मरीना तसेवेतायेवा की कविता शुद्धता और शक्ती के प्रतीक मानी गयी है, उनकी कविता रोमांटिक और जुनूनी कविता मानी जाती है।
उनकी यह कविता 'मैं लिखती रही' मन की गहराई में उतरती है।

मैं लिखती रही

मैं लिखती रही स्लेट पर
लिखती रही पंखों पर
और नदी की रेत पर
बर्फ पर, काँच पर।

लिखती रही सौ-सौ बरस पुराने डण्ठलों पर
सारी दुनिया को बताने के लिए
कि तू मुझे प्रिय है, प्रिय है, प्रिय है
लिख डाला यह इन्द्रधनुष से पूरे आकाश पर।

कितनी इच्छा थी मेरी कि हर कोई
सदियों तक खिलता रहे मेरे साथ,
फिर मेज़ पर सर टिकाये
एक के बाद एक
काटती रही
सबके सब नाम

पर तू जो बँध गया है बिके हुए कलर्क के हाथ
क्यों ङंक मारता है मेरे ह्रदय में
जिसे मैंने बेचा नहीं वह अँगूठी
आज भी रखी है मेज़ पर

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

जीवन और मैं


यह जीवन जब
सत्य कथा के नजदीक जा पहुँचा
तब यकायक साफ हुयी
कई धुधंली पडी हुई चीजें

फिर देखा
जीवन का विन्यास
इतना लम्बा चौड़ा है
पर इसके आहते में
मेरा कितना सामान
समेटा जा सकेगा

पर अब मेरे नजदीक
यह रहस्य नहीं रहा की
जीवन का गोल
चेहरा टटोल लेनें के लिये
दसों ऊँगलिया चाहियें
साबूत की साबूत

बसंत तो कभी पत्झर,
अंधेरा तो कभी उजाला,
आँसू तो कभी मुस्कान,
मेरी यह अंजुरी कभी भी
खाली नहीं रही
जिस जीवन के साये तले मैं
सांस लेने का दंभ भरती रही हूँ
वह खुद भाग दौड कर
अपनी जगह सुनिस्चित करने में
जुटा हुआ है

फिर भी जीवन और मृत्यु के
अंतराल के बीच
सार्थक करना है
मुझे स्वयं को

यही कारण है कि मैं
इन पंक्तियों के लिखें
जाने तक मैं जीवन को जीने की
भरपूर कोशिश में हूँ।