शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

पत्थर होती दुनिया

जीवन की इस आपा धापी में कई परम्परागत मुल्य कम होते जा रहै हैं। मानवीय संवेदनाऐ मानों खत्म ही हो गई हैं। सभी लोग बस पैसों की तरफ दौड रहें है। जो मुल्य कभी हमारे लिये बेहद मुल्यवान थे अब वो ही हमें बोछ लगने लगे हैं। पर जब हम हर तरफ से हम मुसीबत में घिर जाते हैं तब ये मुल्य हमेशा हमें सही रास्ता दिखायेगे ऐसा हमारा विश्वास है। संगीत, साहित्य जैसी कई चीजें अब भी है हमारे पास जो इस पत्थर होती दुनिया को पत्थर होने से बचायेगें।

पत्थर होती दुनिया
मुहावरे अपने अथ
गढने में
नाकाम रहे हैं
शब्द अपनी संवेदनाओ
की तह तक
नहीं पहुँच सके हैं
रोश्नी, अधेरों की
बगलगीर हो गई है
मौन
चीखनें चिल्लानें को
मजबूर हो उठा है।
अवतारों के चमकते चहरे स्याह
पडते लगे हैं
बरसों स्थापित रंग तक
चुराये जा रहे हैं
जीवन राही को
अपनी मंजिल नहीं मिल
सकी है
इस सदी और अवसाद से भरे
दुरूहपुण समय मैं
मैं लिख रही हुँ
कविता
शायद
शब्दों के ताप से
पिघल सके यह
पत्थर होती दुनिया।

सोमवार, 8 सितंबर 2008

गुरु मंञ


हम सभी एक उद्देश्य लेकर इस धरती पर आते हैं। हमारे पास जीने का जितना भी समान है हमें उसी से ही काम चलाना पडता है। इंसानों से लेकर प्रकर्ति के पास अपने जीवन यापन का सभी साजों सामान मौजुद है। सभी जीवित चीजें अपनी निर्धारित गति से ही चलते हैं। आज से ही नहीं आदि अन्नत काल से ही यह नियम रहा है।
धरती पर पायी जाने वाली सभी वस्तुओं को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि हम सभी अपने-अपने दायरे में सुरक्षित हैं यानि हम सभी के पास अपने लिये गुरु मंत्र हैं।
प्रस्तुत है इसी विषय पर एक कविता

गुरू मंत्र


जिंदगी

अपनी मंजिल

खुद ब खुद तलाश लेती हैं

पगडंडियों को कभी कमी

नहीं रही कई जोडी पाँवों की


नदियों को भी हासिल हैं

चप्पुओं की हलचल


पृथ्वी के

पास हैं

मौसमों की बदलती परिक्रमा



आसमान ने भी

जुटा रखे हैं

चाँद, सूरज

ढेर सारे तारें


नन्हें बीज भी

ढूंढ लेते हैं

अपने विस्तार के लिये

थोडी सी जमीन


अपने-अपने

हितों को साधने का गुरू मंत्र

हम सभी के पास सुरक्षित है।

बुधवार, 3 सितंबर 2008

बाढ की विभीषिका

बिहार में इन दिनों जबरदस्त बाढ का प्रकोप जारी है। हर रोज बाढ की विभीषिका की तस्वीरें अखबार में देखने को मिलती है। सवाल यह उठता है, हर साल आने वाली इस बाढ की रोकथाम की व्यवस्था के लिये सरकार के पास कोई कारगर उपाय नहीं है। सभी प्राकृतिक आपदाओं की मार गरीबों पर ही पडती है। उन्हें ही अपने घर से बेघर होना पडता है, अपने ढोर-डंगर सभी को लेकर घुटनें तक के पानी को पार करते हुये गाँव की सीमा को पार कर जाना पडता है दोबारा लौट कर आने के लिये और अगले साल फिर से उसी त्रासदी का शिकार होने के लिये।उस पर राजनेताओ का हवाईजहाज से हालात का जायजा लेना भी एक नाटक ही लगता है।
नाटक
कविता के बदले
उन्हें
उम्मीद थमाई जा रही है
हौसलों के बदले, दुआ

जीवन जैसा ही कोई
नाटक खेला जा रहा है
इस वक्त
अधिकतर सपने
अँधेरों की उपज हैं
जो जरा सी रोश्नी में आते ही
लडखडाने लगते हैं

कविता
प्रतीकार आवेगों का पतिकारों
कभी नहीं रहीं
उसका
इतना बुरा अंजाम
इतिहास में कभी नहीं रहा

केन्दीय सत्ता के
शिखर पर बैठ
अपनें बौनेपन पर
चहकनें वालों को
उनकी हैसियत दिखाने वाला
अब कोई नहीं

आईने
इतने कमजोर हो चले हैं
जो चमकिले चेहरों के
सामने आते ही
तडकनें लगते हैं
बर्बरता अपने चाकु तेज कर रही है
हम निहत्थे खडे हैं
कुछ तो थामों
इस अहिंसावादी देश के इतिहास में
कभी तो हिंसा का बेखौफ नमुना दज हो
समय के साथ न चलना ही
अकर्मण्यता का प्रतीक माना
जाता हो तो कैसा परहेज
वक्त कुछ न कुछ तो सिखा ही रहा है
चाहे बुराई का प्रथम पाठ ही
यह तो तय है ही
कहीं भी हो
बारूद का धुँआ हर घर में पँहुच ही जाता है
और हमारी सहनशीलता को दाद दीजिए
उसी धूयें में हम
टीवी देखते, बतियाते
सपनों का लम्बा बाना ओढ सो जाते हैं
कल की बेहतरी के बारे में सोचते हुये।

बुधवार, 27 अगस्त 2008

प्रार्थना का वक्त


इस भागदौड से भरे माहौल में जीवन की रफतार बहुत तेज होती जा रही है। सभी स्थापित मूल्य बदलते जा रहे हैं। पैसा कमाने और अंधाधुंध आगे बढने की होड में हम आगे और आगे बढते जा रहे हैं अपने मूल्यों की तिलांजली दे कर। सादा जीवन और उच्च विचार की अवधारणा खतम होती जा रही है। भडकिले जीवन अब लोगों की दिनचर्या में नजर आने लगा है। अब किसी त्योहार में वह पहले वाली सादगी नहीं रही, लोग आडम्बर को महत्व देने लगे हैं। ऐसे माहौल में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जीवन को उसी उच्चता से जीते है जो जीवन को जीने का सही तरीका है।

प्रार्थना का वक्त


यह प्रार्थना का वक्त है
सात्विक अहसास के साथ
हाथ जोडकर खडे हो जाओ
यही समय है जब
सभ्यताएं अपनी तयशुदा
भूमिकाएं छोडने के लिए
विवश हो चुकि हैं
भव्य और पुरानी इमारतें
अपने ही बोछ से
छुटकारा पाने के लिए
धीरे-धीरे दरक रही हैं
पिछले हफ्ते के सबसे अमीर
आदमी को पछाडकर
पहले पायदान पर जा विराजा
है कोई अभी-अभी
नंगे पांवों को कहीं जगह नहीं कीमती जूते जरूरत से ज्यादा
जमीन घेरते जा रहें हैं
अंधेरे को परे धकेल
सजसंवर कर रोश्नी सडक पर
आ गई है
उससे दोस्ती करने को
लालायित हैं कई हाथ
अपने भी
वाकई, यही प्रार्थना का
सही वक्त है।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

आज का यह दिन


यूँ तो हर दिन कि शुरूआत सूरज के उगने से ही होती है और हर दिन का अवसान सूर्य के अस्त होने से होता है। हर दिन की अलग कहानी होती है, कोई दिन अपनी शुरूआत में ही भारी दिखाई देता हैं, तो कोई दिन खुशनुमा तबियत लिये पैदा होता है। इनहीं दिनों के तयशुदा घंटों के बीच ही हमें अपनी दिनचर्या चलानी होती है। कोई दिन लाख कोशिशों के बावजुद सरकता नहीं दिखाई देता तो कुछ दिन तेजी से गुजर जाते हैं। कई दिन ऐसे होते हैं जिनहें हम धरोहर की तरह संजो कर रखना चाहते हैं और कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जिनहें हम कभी याद नहीं करना चाहेंगे।
आज का यह दिन
मेरे लिये नहीं है
अमूमन कोई भी
कोई भी दिन मेरे लिये
नहीं होता
फिर भी
दिन की मटमैली चादर
ओढ कर,
रात का
काला लिहाफ
बिछा कर
बना ही लेती हूँ
अपने लिये
पूरे दिन का लम्बा तंबू।
पंक्ति में खडे
आने वाले कलैन्ङरी दिनों में से
एक माकूल दिन
अपने लिये छाँटकर
बाकि बचे हुये
साबूत दिनों को
दुनिया को सौंप कर
शुभकामनायें देती हुयी
लौट पडती हूँ
अपनी बहुत पहले से जमा की
हुई शामों के बीच।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

बहुत पहले से


बहुत पहले से ही कुछ चीजों का होना तय होता है। हर चीजों को घटना एक निश्चित पक्रिया है, हम रोक नहीं पाते उसे तो कोई अपनी किस्मत को कोसता है तो कोई मातम मनाने लगता है। हमारे पास तब केवल एक ही रास्ता है जिंदगी को उसी तरह बहने दो जिस तरह वह बह रही है। उसमें कोई अडचन न आने पाये। हमें केवल काम करने का ही हक है, फल की इच्छा हमें नहीं करनी चाहिये। बहुत पहले से
पक्षियों ने उडान भरनी नहीं सिखी थी
मनुष्यों की पलकें आज सी
भारी नहीं थी।
शोर अपने पाँवों तले
कुचलने की ताकत नहीं रखता था
तब से ही शायद या
उससे भी पहले
ठीक-ठाक नहीं मालूम
इतिहास का लम्बा सूत्र थामें
और वर्तमान की राह पर खडी यह सब कह रही हूँ
तय था
जब से ही
पत्तों का झरना,
प्रेम का यूँ बरबाद होना,
हसरतों का यूँ जमा होना।
बहुत पहले से
पक्षियों ने उडान भरनी नहीं सिखी थी
मनुष्यों की पलकें आज सी
भारी नहीं थी।
शोर अपने पाँवों तले
कुचलने की ताकत नहीं रखता था
तब से ही शायद या
उससे भी पहले
ठीक-ठाक नहीं मालूम
इतिहास का लम्बा सूत्र थामें
और वर्तमान की राह पर खडी यह सब कह रही हूँ
तय था
जब से ही
पत्तों का झरना,
प्रेम का यूँ बरबाद होना,
हसरतों का यूँ जमा होना।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

खुद को दोहराते हम




जीवन का कैनवास बहुत लम्बा चौडा है। हम ढेर सारी चीजें समेट कर चलते हैं जिनमें से कई चीजें पीछे बहुत पीछे छुट जाती हैं तब हम ठहर कर सोचते है कि हमारे लाख चाहने पर भी ऐसा क्या हुआ की वह वस्तु हमें नहीं मिली। तब हार कर हम ढुढतें हैं कोई मंत्र जो जीवन में फिर से रोशनाई भर दे और नहीं तो कम से कम जीवन को जी भर सके। हम अंधेरे से पार नहीं जा सकते तो कम से कम उस से दोस्ती तो कर सकते हैं। सपनें जब टुटतें हैं तब गहरा जखम देतें है तब हमें ही हौसले का दामन धामना ही पडता है और फिर समय सबसे बडा मरहम है जो अपना काम बेखुबी से करता चलता है। तब हमें पता लगता है की जीवन से बडी कोई चीज नहीं है उसके आगे सब चीज छोटी है।


खुद को दोहराते हम



क्या केवल इतिहास ही खुद को दोहराता है


हम नहीं
सपनों के बेल बुटों पर
चढते फिसलते, चोट खाते हम
अपनेआप को साबूत बचाये रखनें
की कोशिश में नाकामयाब हम

स्मतियों के खूबसूरत मोतियों से
जीवन से हर छोटे बडे खानों को
भरने में लगे हम

पीछे छूटे हुए पर अफसोस जताते हुये
किसी नई पहल की चिंगारियों के
इंतजार में हम

जीवन की वध-स्तंभ पर टकरा-टकरा कर
लहुलुहान होते हम
खुद को बार-बार दोहराने की जददोजहद में
बेतहाशा खच होते हम

लाख कोशिशों के बाद भी नहीं रोक पाते
खुद को दोहराने से।