रविवार, 8 मार्च 2009

स्त्री शक्ति को नमन


एक कविता शर्मीला इरोम के लिये


(रोश्नी की लकीर)
हर शब्द भारी है यहाँ
कहाँ हैं मोरपँखी सपनों की उडान
कहाँ प्रसँग हैं इंदधनुषी रंगों की मुस्कान
कहाँ है तिलिस्मी यौवन का उन्माद
पल प्रतिपल की पीडा लेखा जोखा है केवल
यहाँ इस सफेद चादर पर

चारों दीवारों के बीच रोश्नी की
महीन सी आवाजाही
के बीच जीवन की घनी जद्दोजहद है
अस्पताल के इस बिस्तर पर

इस धीमी श्वास के समर्थन के लिये
हजारों हाथ उठ कर
जल्द ही नीचें आ जाते हैं
इन हाथों को दुनियादारी के कई काम निपटानें हैं
दूर तक साथ चलनें का आश्वास्न दे कई आवाजें
भीड में गुम हो जाती हैं

तुम हमारा वर्तमान हो शर्मीला और
हम अपनें वर्तमान को समझनें में पूरी तरह असफल रहें हैं
इतिहास तो खुद ब खुद आगें बढकर थाम लेगा
खून के उन छीटों को
जो किसी को नजर नहीं आ सके
पर यहाँ प्रसंग इतिहास का है उस वर्तमान जो
ठीक हमारी नाक के नीचें से गुजर कर
इतिहास में अपनी कायरता की कहानी दर्ज करेगा

शर्मीला केवल तुम्हारी आवाज ही है
जो प्रतिध्वनि तक अपनी उर्जा बचाये रखती है
तुम्हारा रास्ता बेहद सीधा है और
शांत भी
हम शोर में रहने वालों को
तुम्हारी शांति बेचैन करती है

सूरज से टक्कर लेता तुम्हारे चेहरें का तेज और
तुम्हारी संघर्ष गाथा के एक एक शब्द हमें स्फुर्ती
देतें हैं
भारी बूटों की ठक ठक
बंदूकों की बट
अब एक चुनौती है
तुम्हारें नाजुक कँधों पर
हजारों जालिमों के कर्त्यों का भार है

पर तुम खुद सबसे सबल हथियार हो शर्मीला
संघर्ष की जो गहरी लाल रेखा तुम्नें उकेरी है
वह अपनी स्थापना का सफल उत्सव अवश्य मनायेगीं
रोश्नी की जो लकीर तुम्हें जीवन का खाद पानी उपलब्ध
करवा रही है हमें भी उस से एक बेहतर उम्मीद है।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

जिन्दगीं

एक सपना दूसरे

सपनें से टकराता है

तो चमक पैदा करता है



एक रिश्ता दूसरें के निकट आता है

फिर नाकाम हो लौटता हैं



एक मुस्कुराहट

जो कहीं गुम हो टूटता तारा बन जाती है



एक उम्मीद जो आखिर में

खुद को

राख के ढेर में पाती है



जिंदगीं कहीं इन्हीं

अदभुत रिश्तों का नाम ही तो नहीं।

शनिवार, 31 जनवरी 2009

कम्युनिटी रेडियो---- समाज सेवा का नया स्वरुप



बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब रेडियो केवल संगीत और खबरें सुनने का सस्ता और सरल माध्यम था। रेडियो की लोकप्रियता के उस दौर में रेडियो सिलोन और अमीन सयानी एक दुसरे के पर्याय बन गये थे।
आज से कई साल पहले यह बात असंभव लग सकती थी पर आज के दौर में रेडियो भी समाज सेवा का नया माध्यम बन कर उभर रहा है। संचार के माध्यम इतने सक्षम हो चुके हैं कि हररोज इसके नये आयाम देखने को मिल रहे हैं और यही कारण है अब रेडियो समाज सेवा के काम भी आ रहा है।
यह सब संभव हुआ जब भारत सरकार ने मान्यता प्राप्त सरकारी संस्थाओं को कम्युनिटी स्टेशन स्थापित करने कि अनुमति प्रदान की। भारत में कम्युनिटी रेडियो को अधिकृत करने की योजना की शरुआत १९९० के मध्य में हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने यह घोषणा की कि हवाई तरंग जन संपदा है। कैबिनेट ने १६ नवम्बर २००६ को को स्वयं सेवी संस्थाओं को कम्युनिटी स्टेशन स्थापित करने की स्वीकृति दे दी। हमारे देश में इस समय ३८ कम्युनिटी रेडियो स्टेशन चल रहे हैं। सरकार ने कम्युनिटी स्टेशन स्थापित करने के लिये कुछ दिशा निर्देश दिये हैं जैसे
१ इन स्टेशन पर समसाम्यिक मामलों की जानकारी नहीं दी जा सकती।२ कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का दायरा ५से १० कि मी से ज्यादा नहीं होना चाहिये। ३ टावर की ऊँचाई ३० मी से ज्यादा और १० मी से कम नहीं होनी चाहिये।४ स्टेशन को मिलने वाला अनुदान किसी मलटीलेटरल संस्था का होना चाहियेकम्युनिटी रेडियो स्थापित करने में ज्यादा व्यय नहीं आता केवल दो से लेकर ५ लाख में यह लग जाता है।
तमिलनाडु का आना विश्वविध्यालय ऐसा पहला विश्वविध्यालय है जहाँ पहला कम्युनिटी रेडियो स्थापित हुआ। इससे कैम्पस में स्थापित होने से संस्थान में होने वाली हर गतिविधि की जानकारी मिली और सभी का इस तरह के रेडियो के फायदे की तरफ ध्यान गया।
जब कम्युनिटी रेडियो का प्रसारण किसी स्थान विशेष के लिये किया जाता है तो वहाँ की समस्याऐं का निवारण और उनकी संस्कृति, उनका रहन सहन का पता चलता है। स्थानीय जनता में कम्युनिटी रेडियो बेहद लोकप्रिय होते हैं क्योकि वे उस स्थान विशेष के लोगों के सरोकारो से जुडे होते हैं। इसके बरकस व्यवसायिक रेडियो का मुख्य उदेश्य मुनाफा कमाना होता है। सबसे बडी बात यह है कि इससे हमारे समाज के वे हाशिये के लोग लाभांवित होते हैं जो न्युनतम चीजों से अपना जीवन चलाते हैं और उन्हें अपने अधिकारों के बारे में पता नहीं होता इसी कारण वे हमेशा शोषण का शिकार होते रहते है। कम्युनिटी रेडियो लडकियों में शिक्षा का प्रसार, किसानों को फसलों की जानकारी, संस्कृतिक विकास, सेहत के बारे में जानकारी, महिलाओं को स्वरोजगार के बारे में जानकारी मिलती है जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकती हैं, उनहें अपने ऊपर हो रही हिंसा के खिलाफ आवाज ऊढाने का बल मिलता है। बाजार के भावों की जानकारी के साथ-साथ सामाजिक भेदभाव और अंधविस्वास को दूर करने में बेहद यह रेडियो कारगर सिद्ध हो सकता है। कम्युनिटी रेडियो में सबसे बडी खासयित यह है कि इसमें स्थानीय लोगों को शामिल किया जाता है, उनहें उपकरणों के बारे में जानकारी दी जाती है, प्रसारण का सारा दारोमदार कम्युनिटी के लोग ही करते हैं, जिससे उनके भीतर छुपी प्रतिभा भी उजागर होती है और उनका आत्मबल बढता है।
यहाँ यह बात ध्यान रखने की है कि कम्युनिटी रेडियो में महिलाओं की भुमिका अहम होती है। क्योकि वे अपने आस पास के वातावरण से बखुबी परिचित होती हैं। एक सर्वे के अनुसार क्मयुनिटी रेडियो के सटाफ और अन्य कायों में ४५ प्रतिशित महिलाओं का योगदान होता है।
कम्युनिटी रेडियो में शिक्षा, जानकारी और मनोरंजन तीनों का समावेश होता है। कम्युनिटी रेडियो का नारा है कम्युनिटी के द्वारा कम्युनिटी के लिये।
भारत जैसे विशाल और अविकसित देश में कम्युनिटी रेडियो का सही और व्यापक इस्तेमाल सामाजिक क्रांति ला सकता है। दुनिया भर में कम्युनिटी रेडियो का विस्तार हो रहा है, इसे लेटिन अमेरिका में पोपयुलर रेडियो, अफ्रीका में लोकल रेडियो, युरोप में इसे फ़्री या रेडियो कहा जाता है। इनके माडल भिन्न होते हुये भी इन्के सरोकार एक ही है, कम्युनिटी की आवाज को बढाना और जनतंत्र कम्युनिटी का कम्युनिटी स्तर पर विस्तार करना। युनेस्को ने कम्युनिटी रेडियो कि पहुँच को व्यापक बनाने के लिये बंगलादेश, मालद्वीप में कई कार्यक्रम आयोजित किये हैं और भारत में भी वह काफी बडे स्तर पर इस दिशा में काम करने की योजना है।
अभी दो साल में ही कम्युनिटी रेडियो ने आशातीत सफलता पा ली है। भारत सरकार का आने वाले सालों में देश भर में ४००० कम्युनिटी रेडियो स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य है। आशा करते हैं कम्युनिटी रेडियो आने वाले समय में समाज सेवा का प्रबल हथियार बन कर उभरेगा और इसके प्रयोग से समाज के निचले तबके का विकास होगा और इस तरह समाज में एक विकास की क्रांति आयेगी






women empowerment

community radio

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

चलो नये साल में प्रवेश करें


हमें हर वक्त कुछ नया चाहियें
तो नया साल क्या बुरा है
हम सब ही नये साल की ओर लपकेंगें और
निचोड लेंगें उसका नयापन भी
भर देंगें उसमें वो ही उदासी, पीडा और वो
तमाम खामियाँ जो हमनें बीते बरस कमाई थी
हम पूरी तरह से तैयार बैठे हैं
पुराने साल को इतिहास के सूखे खोल में बिठानें के लिये
पर क्या हम असानी से भूला पायेंगें
उन तारीखों को जब हम फुट फुट कर रोये थे
और कोई हमारे पास नहीं था
हम खुशियाँ बाँटना चाहते थे
पर हमारी खुशियाँ केवल हम ही से बातें करते करते
बेहद अकेली पड गयी थी
इस दुनियादारी के फैलते बाजार में हम
अपने को और कितना खर्च कर पायेंगें
न जाने आने वाले नये साल में हम
कितने दोस्तो को दुश्मनों में तबदील हुआ देखेगें
तमाम आशा भरे विश्वास के साथ इस साल भी
कुछ चीजों के बदलने के आसार कम हैं
मसलन नेताओं के आचरण इस साल भी नहीं बदलेगें
कई नये हैरतअंगेज घोटालों की पोल खुलेंगी
इस नये साल में हम
ऐक बरस और पुरानें पड जायेगें
और अपने आप को सुधारनें के
प्रयास में हम इस कई बार करेगें
हो न हो यह साल उनका होगा
जो इस कोने से उस कोने को
हरा भरा बनाने में लगे हैं
यकिनन उनका ही होगा यह नया साल
जो हर चेहरे को नया रंग देने में जुटे हैं
चलों इक बार फिर
कामनाओं की भारी पोटली लादे
नये साल की ओर रुख करें।

शनिवार, 8 नवंबर 2008

आने वाले कल में

विज्ञानं के क्षेत्र में कई तरह के प्रयोग होते रहे हैं। अमेरिकन विज्ञानिक समुदाय के अनुसार मानव इतिहास की सबसे बडी खोज खनिजो के लिये बनाई गयी पिरियोडिक टेबल है। दुसरी बडी खोज लोहे की खोज है, तीसरी रेडियो की खोज तथा चौथी ग्लास की खोज तथा पाँचवी खोज सतहरवी शताबदी में ओपटीकल माईकरोसकोप को माना गया है। छटी खोज कंकीट की खोज है।
वैझानिकों द्वारा कई तरह की खोजबीन होती रही हैं, अब वे सामान्य कोशिकाओं को इनसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं में परिवर्तित करने की एक नई तकनीक इजाद की है। जिसका नाम है डारेयकट रिपरोगरामिंग। शरीर की प्रमुख कोशिका जिसका नाम सटैम सैल है जो अब तक ओरगन और टिश्यु ट्रांसप्लांट में कोई मदद नहीं करते थे अब वे
शुगर की पुरानी बिमारी में जिसमें कि पैनकरियेटिक कोशिकाऐ शरीर के इमयुन तंत्र द्वारा गलती से नष्ट हो गई थी में मददगार होगीं।
हार्वर्ड मैडिकल वैझानिक मेलटन, जो कि विश्व के बेहतरीन सैटम सैल के जानकार कहते हैं ये जो नई कोशिकाऐ हैं ये किसी चूहे के पूरे जीवन भर स्थायी रहती है। वैझानिकों ने सैटम सैल को यह दिखानें के लिये गिना कि किस तरह टिश्यु और औरगन दुबारा बनाये जा सकते हैं
इनसुलिन पर प्रयोग लगभग एक दशक से चल रहे हैं। १९९६ में डोली नामक भेड भी इसी खोज का ही परिणाम थी

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008

जीवन के भीतर स्त्री


हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा २३ अकटूबर में आयोजित महिला विमर्श पर चंदीगढ में आयोजित विशिष्ट अतिथि के रूप में आलोचक निमला जैन ने कहा समाज में महिलाओं की भिन्न भिन्न समस्याऐं हैं। समाजसेविका निमल दत्त ने कहा महिलाओं की दशा अभी भी शोचनीय है। केवल कुछ महिलाओं की स्तिथी ही सुधरी है उससे ही हमें संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिये। मैत्री पुष्पा ने बेहद सहज ढंग से अपनी रचना प्रक्रिया और अपने बचपन के दिनों को वहाँ उपस्तिथ लोगों के साथ शेयर किया। प्रख्यात रोहिणी अगवाल ने कहा पराम्परागत प्रथाये अगर बेडियाँ बन जायें तो हमें उन्हें छोड देनी चाहियें। वहाँ साहित्य अकादमी के निदेशक देश निमोही, पदीप कासनी, कलम सिगं कूण्डु उपस्तिथ थे।अपहरान दो बजे कवियत्री सम्मेलन शुरू हुआ जिसमें रोजलिन, सुशीला, सरोज, नमिता राकेश, आशिमा कौल, विपिन चौधरी ने कविता पाढ किया।

जीवन के भीतर स्त्री


लम्बी चौडी जायदाद नहीं
एक घर चाहती हैं वे केवल
शायद पूरा घर भी नहीं
बस एक चुल्हा ताकि
घर भर को खिला कर
संतुष्ट हो, सो सके
कल के भोजन के बारें में
फिक करते हुये।
चाँद की कहानी कहते हुये वे चाँद पर जा पहुँचती हैं
अपनी कमनियता के किस्सों को
हवाओं में बिखरते हुये
कुछ न करते हुये भी
बहुत कुछ कर रही होती हैं वे
अपनी सृजनशीलता से रच रही होती है
स्वपनिले संसार की रूपरेखा
हमेशा बचाये रखा है उन्होनें
घर का सपना
आँधी तुफानों के बीच भी
जितनी शिद्दत से वे प्रेम करती है
उतनी ही शिद्दत से घृणा।
मासुमियता, उदारता, करुणा के विष्षणों के साथ
वे बेहद खूबसूरत दिखाई पडती हैं
कभी कभी वे सच के इतने करीब होती हैं
की छू सकती हैं अपनी आत्मा का पवितर जल
कभी वे बिना पक्षपात के इतनी झूठी हो सकती है
की आप दुनिया जहान से नफरत करने लगें
अपनी अनेकता के साथ
राधा, मीरा, सीता का बाना ओढती हैं
एक देश में अरृणा राय तो
दुसरे देश में सु कि
किसी तीसरे देश में शीरीन आबादी बन
अपने आप को सिदध कर रही होती हैं
उन्कें यहाँ हक्कीत और स्वपन में अधिक अंतर नहीं है
यही एकमात्र कारण है
हक्कीत को सपना और
सपने को हक्कीत समझनें में वे भूल कर देती हैं
जीवन का नब्बे प्रतिशत प्रेम
उन्के करीब से हो कर गुजरता है
उन्का साथ इन्दरधनुष, तितली, फुल, कविता,
खुश्बू, घटाओं और जिंदगी का साथ है
उन्की आखें जिस क्षण तुम्हारी ओर
देखती है वे क्षण ठहरे रहते हैं हमेशा
तमाम उमर तुम उन क्षणों के बीच से होकर
गुजरना चाहते हो तुम
कभी वे मुस्कुराहट बन
तस्वीर के चारों कोनों में फैल जाती हैं
तो कभी आँसुओं की तरह
शून्य में सिमट जाती हैं
स्त्री कभी बिखरती नहीं
अरबों खरबों अणुओं में जुडती नहीं
बिम्ब से मूरत में तबदील हो
माँ, बहन, बेटी बन जाती है
और कविता के अंदर
हमेशा जीवित रहती हैं
संवेदना बन कर।