सोमवार, 21 जुलाई 2008

यह धुआँ कहाँ से उठता है

दिलीप कुमार की बेहतरीन अदाकारी, सुचित्रा सेन की मासुमियत और वैजयतीमाला का बेहतरीन नृत्य।शरतचंद्र चटर्जी की कालजयी कहानी देवदास को लेकर विमल मित्र ने जो इतिहास रचा था उसे दोहराने की कोशिश में हमारे कई प्रतिभावान फिल्म निदेशक असफल रहे हैं। देवदास का संगीत दिया था सचिन देव बर्मन ने। इस फिल्म के सभी गीतों ने गजब ढाया था कोई कैसे भुल सकता है मितवा मितवा के दर्द भरे बोल थे, आगे तेरी मरजी का खूबसूरत गीत और जिसे तू कबुल कर ले वह कली कहाँ से लाऊँ का अवसाद से भरा गीत। दिलीप कुमार इस फिल्म में महज २६ साल के थे और देवदास में काम के बाद ही ट्रेजेडी किंग का खिताब मिला था। उन्की चुप्पी उन्कें शब्दों पर भारी पडती दिखती रही हमेशा। वे देवदास के किरदार में इतना ढुब गये थे उन्हें साईकोलोजिसट की मदद लेनी पडी थी।
देवदास की कहानी अतिभावनात्तमक कहानी है। शरतचंद्र ने खुद इस तरह की नियती को अच्छा नहीं माना था। जीवन कुछ सीधी सीधी रेखा में आगे बढता तो शायद उसमें असाधारणता न होती। एक सपने के पूरे होने की राह में जो अडचन आती हैं उन्हीं से टक्कर लेते लेते एक जीवन अस्त हो जाता है और दुसरी ओर एक शमा है जो शायद जलने के लिये ही इस दुनिया में आयी है। मुझे इस फिल्म के दो सीन हमेशा याद रहेगें एक, जब बडा होकर देवदास, पार्वती से मिलने ऊपर जाता है और लालटेन की रोशनी में पार्वती से पुछता है कैसी हो पार्वती और दुसरा जब रात में देवदास के पास छुप कर आती है तो देवदास जिस भोलेपन से कहता है तुम अकेली रात में मेरे कमरे में आयी हो, अब मैं तुम्हें बदनाम करूँ। वो सपने ही तो थे जो देवदास के इतने करीब बस गये थे वो लौट कर नहीं जाना चाहते थे। वो अपने बसने के लिये थोडी सी जमीन मागतें थे। दुनिया वो भी उन्से छीन लेती है। तब वे सपने रोते बिसुरते हुये दूर दूर तक बिखर जाते हैं और साथ ही टुट जाता है देवदास भी। बाकी बचा रह जाता है धुंआ जो हमेशा किसी न किसी चाहने वाले को लीलता रहेगा।
धुआँ
क्या हम कभी नहीं जान पायेगे
कि भीतर का यह धुआँ कैसे उठा
क्योंकर उठा
क्या कुछ जला है भीतर
क्या सुलगा रहा है
भीतर
एक दिल ही तो है
शायद दिल ही है
यकिनन दिल ही है
दिल ही सुलगने की कुरवत रखता है
या सपने सुलग सकते है
मामला दिल का हो तो
कई चीजें अनायास ही उससे आ जुडती हैं
और सुलगने का सामान बनती हैं
इस सुलगने समय में
हमारी तनहाई ही मेरा सबसे बडा हथियार बनती है
तब भीड के दिलासा देने के सभी दावे खोखले पड जाते हैं
कुछ सपने कुछ हक्किते
कुछ बातें, थोडी खामोशी
का लेखा जोखा जो हमारे पास सुरक्षित है
जो सुलग सकते है यह आग उन्हीं को
जलाती है जो जल सकते हैं
जो भस्म हो सकते हैं
जो राख में तबदील हो सकते हैं
जो एक लम्बी उमर धुँये को अपने में समाये रख सकते हैं।

4 टिप्‍पणियां:

richa ने कहा…

kavita ke jariye aapne mahanagron ki jis parkar vyakhya ki hai wo sarahniy hai. isi tarha ki kivta likhti rahain.

richa ने कहा…

Devdas meri pasindida fims me se ek hai ye ek kaljayi film hai. is film me Dilip kumar, Suchitra sen , vaijyaanti mala ne apne apne kirdar ko jivant kar diya.

Sunil Deepak ने कहा…

विपिन जी, मुझे देवदास की कहानी उसके नकारात्मक अंत की वजह से अच्छी नहीं लगती पर यह फ़िल्म अवश्य अच्छी लगी थी, विशेषकर वैजयंतीमाला द्वारा निभाया रोल. मुझे दिलीप कुमार कभी अच्छे नहीं लगे हालाँकि उनका अभिनय बढ़िया होता था, पर जाने क्यों उनके रुक रुक कर बोलने से कुछ चिड़ से होती थी! देवदास के मुकाबले मुझे परिणीता की रुमानियत अधिक अच्छी लगती थी.

mona ने कहा…

aap ki kavita mein kuch alag hi baat hai, jo baat mujhe kisi or ki kavita mein najar nahi aai.....