सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

जगजीत सिंह; ग़ज़ल गायकी का शाही अंदाज


कैसे भुलाई जा सकती है ऐसी पुरकशिश आवाज़ जिस में अवसाद का गाढ़ा स्वाद, प्रेम का सुरमई रंग और जीवन की खुशनुमा चह चाहट घुली मिली हो. राजस्थान की मिट्टी का यह गायक अपने शहर गंगानगर से लेकर राष्ट्र और अंतररास्ट्रीय स्तर पर अपनी जानदार गायकी के बल पर पहचाना जाता था.
मेरे कानों से उनके इस बुलंद स्वर का परिचय उस वक़्त से है जब मै सातवी कक्षा मे थी. दूरदर्शन पर एक ग़ज़ल सुनी थी ' न दोस्त है न रकीब है कोई. उसके बाद नया टेप रेकॉर्डर लेने के बाद इन्सेर्च, एन्कोरे, लव इस ब्लेंड, मरासिम, और अर्थ के कालजयी गीतों की तीन कैसेट्स सुन सुन कर ख़तम कर डाली थी.
और फिर गुलज़ार द्वारा मिर्ज़ा ग़ालिब पर बनाया गया टेली विज़न धारावाहिक में ग़ालिब की नज्मो और गजलो को बेहद खूबसूरत आवाज़ दे कर मैं लगभग चमत्कृत हो गयी थी. जगजीत सिंह ने निदा फाजली को सबसे जयादा गया, दुष्यंत की गजले और ढेर सारे पंजाबी और हिंदी फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी गीत. फिल्म अमर प्रेम का यह गीत होटों को छु लो तुम मेरा गीत अमर कर दो तो सभी के होटों पर थिरकने लगा था.
मेडिकल ट्रांस क्रिप सन के दौरान हमारे सर डॉक्टर भारद्वाज बताया करते कि उनके पी जी आई चंडीगड की पढ़ाई के दौरान शाम के समय जगजीत सिंह औपचारिक महफ़िल जमाते थे और लगभग आधी रात तक शिव कुमार बटालवी की गजले गाया करते थे जिसमे हम डाक्टर लोग डूब जाते थे
फिर बाद मे कुछ बड़ा होने पर जब मेहँदी हसन की गायकी सुनी तो उनकी आवाज़ के जादू मे कायल हो गयी थी मै पर तब भी जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू सर पर सवार रहा जो हमेशा अपना असर जमाये रहेगा.

1 टिप्पणी:

McWell ने कहा…

प्रिय विपिन जी,
अच्छा लिखा है. लिखते रहिये. पढ़ने का मौका मिलता रहेगा. शुभकामनाओं के साथ.

मुन्नी चौधरी