गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008

पुस्तक पर्व


अच्छी किताबों कि उपयोगिता से हम सभी वाकिफ हैं। टेलीविजन, इंटरनेट के व्यापक प्रभाव के बावजुद किताबें पढने
का एक अलग ही आनंद है, अब जब इस आनंद से सराबोर होने का सुअवसर दिल्ली विश्व पुस्तक मेले ने उपलब्ध
करवाया है तो चलो दिल्ली की ओर कदम बढाया जाये। २००४ में पहली बार विश्व पुस्तक मेले मे जाना हुआ, चारो
ओर पुस्तके ही पुस्तके देख कर मन खुश हो गया। इसके अलावा कई साहित्यकारो जिन्हें अब तक पढा है, से रुबरु
होने का भी मौका मिला। राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, केदारनाथ सिहं, ओम थानवी आदि जिनसे कुछ देर बात करने
से साहित्यक ऊर्जा मिली।
भारत में लिखने की कला बहुत पुरानी है यह संकेत मिलते हैं कि रामायण ५५००० ईसवी से भी पहले और
शायद २३००० ई वी से भी पहले लेखन होता रहा है।अच्छी किताबों कि उपयोगिता से हम सभी वाकिफ हैं।
भारत में लिखने की कला बहुत पुरानी है यह संकेत मिलते हैं कि रामायण ५५००० ई वी से भी पहले और
शायद २३००० ई वी से भी पहले लेखन होता रहा है।
युनेस्को का एक काम पु्स्तकों की सँख्या और पुस्तकों के पकार दोनों पर नजर रखना भी है। इजराईल और इग्लैंड
संसार में सबसे ऊपर है हर साल नये टाईटल निकालने में। हिन्दी २०० मिलियन लोगो कि मातभाषा है इसके बावजुद
भारत में २५ हिन्दी और अंग्रेजी के ४४ अखबार निकलते है। भारत अंगेजी पुस्तकों के प्रकाशन में तीसरे नम्बर पर
है और एकमात्र देश भी है जो ३२ भाषाओं में पुस्तकों का प्रकाशन करता है।
वैसे जीवन का सफर किताबों से जोडे तो एक कविता इस प्रकार हो सकती है।
इसी सन्दर्भ पर एक कविता
पहला और आखिरी
पहले पृष्ठ की पहली पंक्तिऔर पहला पहला शब्द
ऊँगली धामें चलता
गिरता पढता
फिर हौले हौले चलता
लडखडाता हुआ
इसी शब्द नें सभी
संम्भावनाओं को जन्म दिया
बीच के सभी शब्द
अस्पष्ट
धुंधलें, स्थुल, मटमैले
दुनियादारी की धुल मिट्टी से लिपटे हुये
अंत के शब्द अपनी धकान का बोछ
दुसरों पर डालते हुये
तनावगस्त, आत्ममुग्धता में पंगे हुये
सपनों की ढलान से
उदास उतरते हुये।

1 टिप्पणी:

Shastri ने कहा…

लेख अच्छा लगा, खासकर इसलिये कि मेरा जीवन तो किताबों में ही बीतता है.

कविता भी अच्छी लगी.

कृपया और अधिक नियमित लिखा करें.

आपके लेख की पंक्तियां टूट रही हैं. कृपया आगे से सज्जा पर और अधिक ध्यान दें !!