मंगलवार, 29 जून 2010

चाक पर जीवन


अनगढ,
बेलौस, बेडौल, हज़ारों-हज़ारों
परतों, अणुओं, खुशबुओं सा जीवन


कभी पकता भाप में,
कभी सिकता ताप में
सूखता पल भर में मिली छाया तले


गुंथता, धपकियाँ सहता
फिर देर-सवेर
पा ही जाता अपना असली स्वरूप
चाक पर ही घूमते-घूमते।

1 टिप्पणी:

आचार्य जी ने कहा…

सुन्दर लेखन।